हिन्दु विवाह अधिनियम 1955 के बारे मे जानकारी हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् 1955 में पारित एक कानून है।

हिन्दु विवाह अधिनियम 1955 के बारे मे जानकारी हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् 1955 में पारित एक कानून है। इसी कालावधि में तीन अन्य महत्वपूर्ण कानून पारित हुए हिन्दू उत्तराधिका अधिनियम 1956 हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम 1956 और हिन्दू एडॉप्शन और भरणपोषण अधिनियम 1956 ये सभी नियम हिन्दुओं के वैधिक परम्पराओं को आधुनिक बनाने के ध्येय से लागू किए गये थे। परिचय स्मृतिकाल से ही हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। किंतु विवाह जो पहले एक पवित्र एवं अटूट बंधन था अधिनियम के अंतर्गत ऐसा नहीं रह गया है। कुछ विधिविचारकों की दृष्टि में यह विचारधारा अब शिथिल पड़ गई है। अब यह जन्म जन्मांतर का संबंध अथवा बंधन नहीं वरन् विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है। अधिनियम की धारा 10 के अनुसार न्यायिक पृथक्करण निम्न आधारों पर न्यायालय से प्राप्त हो सकता हैत्याग 2 वर्ष निर्दयता शारीरिक एवं मानसिक कुष्ट रोग 1 वर्ष रतिजरोग 3 वर्ष विकृतिमन 2 वर्ष तथा परपुरुष अथवा पर-स्त्री-गमन एक बार में भी अधिनियम की धारा 13 के अनुसार य संसर्ग धर्मपरिवर्तन पागलपन 3 वर्ष कुष्ट रोग 3 वर्ष रतिज रोग 3 वर्ष संन्यास मृत्यु निष्कर्ष 7 वर्ष पर नैयायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के दो वर्ष बाद तथा दांपत्याधिकार प्रदान करनेवाली डिक्री पास होने के दो साल बाद संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता है।स्त्रियों को निम्न आधारों पर भी संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता हैय यथा-द्विविवाह बलात्कार पुंमैथुन तथा पशुमैथुन। धारा 11 एवं 12 के अंतर्गत न्यायालय विवाहशून्यता’की घोषणा कर सकता है। विवाह प्रवृत्तिहीन घोषित किया जा सकता है यदि दूसरा विवाह सपिंड और निषिद्ध गोत्र में किया गया हो धारा 11 नपुंसकता पागलपन मानसिक दुर्बलता छल एवं कपट से अनुमति प्राप्त करने पर या पत्नी के अन्य पुरुष से जो उसका पति नहीं है गर्भवती होने पर विवाह विवर्ज्य घोषित हो सकता है। धारा 12।अधिनियम द्वारा अब हिंदू विवाह प्रणाली में निम्नांकित परिवर्तन किए गए हैं1 अब हर हिंदू स्त्रीपुरुष दूसरे हिंदू स्त्रीपुरुष से विवाह कर सकता है चाहे वह किसी जाति का हो।झ2 एकविवाह तय किया गया है। द्विविवाह अमान्य एवं दंडनीय भी है।3 न्यायिक पृथक्करण विवाह-संबंध-विच्छेद तथा विवाहशून्यता की डिक्री की घोषणा की व्यवस्था की गई है।4 प्रवृत्तिहीन तथा विवर्ज्य विवाह के बाद और डिक्री पास होने के बीच उत्पन्न संतान को वैध घोषित कर दिया गया है। परंतु इसके लिए डिक्री का पास होना आवश्यक है।5 न्यायालयों पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया है कि हर वैवाहिक झगड़े में समाधान कराने का प्रथम प्रयास करें।6 बाद के बीच या संबंधविच्छेद पर निर्वाहव्यय एवं निर्वाह भत्ता की व्यवस्था की गई है। तथा7 न्यायालयों को इस बात का अधिकार दे दिया गया है कि अवयस्क बच्चों की देख रेख एवं भरण पोषण की व्यवस्था करे।विधिवेत्ताओं का यह विचार है कि हिंदू विवाह के सिद्धांत एवं प्रथा में परिवर्तन करने की जो आवश्यकता उपस्थित हुई थी उसका कारण संभवतः यह है कि हिंदू समाज अब पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति से अधिक प्रभावित हुआ है। विवाह संबंधी अपराध और कानून विवाह संबंधी अपराध की धारा 493 से 498 तकधारा-493 स्त्री को इस विश्वास में रखकर सहवास कि वह पुरुष उससे विधिपूर्वक विवाहित हैधारा-494 पति-पत्नी में से किसी एक के द्वारा दूसरे के जीवित रहने के बावजूद दूसरा विवाह करना धारा-495 एक पक्ष द्वारा अपने पूर्ववर्ती विवाह को छुपाकर दोबारा से विवाह करनाधारा-496 लड़का या लड़की द्वारा छलपूर्ण आशय से विपरीत पक्ष को यह विश्वास दिलाना कि उनका विवाह विधिपूर्वक मान्य नहीं है।धारा-497 जारकर्मधारा- 498 आपराधिक आशस से किसी पुरुष द्वारा विवाहित स्त्री को फुसलानाधारा-498 कः किसी विवाहित स्त्री पर पति या पति के नातेदार द्वारा क्रूरतापूर्ण व्यवहारवैवाहिक मुकदमों की प्रकृति कानूनन वैवाहित स्थिति में स्त्री की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया है वैवाहिक मुकदमों की प्रकृति देखें तो अक्सर वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष पर  दहेज प्रताडना शारीरिक शोषण और पुरुष के पर स्त्री से संबंध जैसे मामले दर्ज कराए जाते हैं वहीं वर पक्ष द्वारा स्त्री का किसी गैर मर्द से अवैध संबंध मानसिक प्रताडना जैसे मामला दर्ज कराने के मामले देखे गए हैं वैसे कई बार अदालत में यह भी साबित हुआ है कि वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को तंग करने के लिए अक्सर दहेज के मामले दर्ज कराए जाते हैं। तिहाड़ के महिला जेल में छोटे-से बच्चे से लेकर 90 वर्ष की वृद्धा तक दहेज प्रताडना के आरोप में बंद हैं दहेज है स्त्री धन– दहेज का अभिप्राय विवाह के समय वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी गई चल-अचल संपत्ति से है। दहेज को स्त्री धन कहा गया है। विवाह के समय सगे-संबंधियों नातेदारों आदि द्वारा दिया जाने वाला धन संपत्ति व उपहार भी दहेज के अंतर्गत आता है यदि विवाह के बाद पति या पति के परिवार वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर दूसरे पक्ष को किसी किस्म का कष्ट संताप या प्रताडना दे तो स्त्री को यह अधिकार है कि वह उक्त सारी संपत्ति को पति पक्ष से वापस ले लेहिंदू विवाह अधिनियम की धारा-27 स्त्री को इस प्रकार की सुरक्षा प्रदान करती है। वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फाजिल अली ने अपने एक फैसले में निर्णय दिया था कि स्त्री धन एक स्त्री की अनन्य संपत्ति है यह संपत्ति पति पक्ष पर पत्नी की धरोहर है और उस पर उसका पूरा अधिकार है। इसका उगंघन दफा-406 के तहत अमानत में ख्यानत का अपराध है जिसके लिए जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान है। इस निर्णय की वजह से धारा-27 की समुचित व्याख्या हो गई हैकानूनन स्त्री की सुरक्षा क्रिमिनल अमेंडमेंट एक्ट की धारा 498 क के अनुसार एक विवाहित स्त्री पर उसके पति या उसके रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार या क्रूरता का व्यवहार एक दंडनीय अपराध है। विधि में यह प्रावधान भी है कि विवाह के सात वर्ष के भीतर यदि पत्नी आत्महत्या कर लेती है या उसकी मौत किसी संदिग्ध परिस्थिति में हो जाती है तो काननू के दृष्टिकोण से यह धारणा बलवती होती है कि उसने यह कदम किसी किस्म की क्रूरता के वशीभूत होकर उठाया है पत्नी द्वारा किया जाने वाला अत्याचार  अदालत में स्त्री को मिली कानूनी सुरक्षा का माखौल उड़ते भी देखा गया है अपने पूर्व के प्रेम संबंध जबरदस्ती विवाह आपस में सामांजस्य नहीं बैठने या किसी अन्य कारणों से स्त्री इन सात वर्षों में आत्महत्या की धमकी देते हुए पति का मानसिक शोषण करने की दोषी भी पाई गई हैं जबरदस्ती दहेज प्रताडना में पूरे परिवार को फंसाने का मामला आए दिन सामने आता रहता हैनिष्कर्ष- विवाह वास्तव में एक जुआ की तरह है यदि दांव सही पड़ गया तो जीवन स्वर्ग अन्यथा नरक के सभी रास्ते यहीं खुल जाते हैं अच्छा यह हो कि विवाह के लिए जीवनसाथी का चुनाव लड़का-लड़की खुद करे यानी प्रेम विवाह करे और विवाह होते ही कम से कम सात साल तक दोनो अपने-अपने परिवार से अलग आशियाना बसाए देखा गया है कि पारिवारिक हस्तक्षेप के कारण ही एक लड़का-लड़की का जीवन नरक बन जाता है पारंपरिक अरेंज मैरिज में भी मां-बाप बच्चों की शादी कर देने के बाद उन्हें स्वतंत्र रूप से जिंदगी जीने दें तो दोनों का जीवन सामांजस्य की पटरी पर आसानी से दौड़ पाएगा बाल विवाह– वर्ष 1929 में बाल विवाह निरोधक अधिनियम में 1978 में संशोधन कर विवाह के लिए पुरूष की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और स्त्री की आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। यह संशोधन एक अक्टूबर 1978 से लागू है। भरण–पोषणअपनी पत्नी के भरण-पोषण की पति की जिम्मेदारी विवाह से संपन्न होती है। भरण-पोषण का अधिकार वैयक्तिक कानून के तहत आता है। अपराध दंड प्रक्रिया संहिता 1973 1974 का दो के अनुसार गुजारा निर्वहन का अधिकार पत्नी और आश्रित संतानों को ही नहीं अपितु निर्धन माता-पिता और तलाकशुदा पत्नियों को भी दिया गया है। परंतु पत्नी आदि का दावा पति के पास उपलब्ध साधन पर निर्भर करता है। सभी आश्रित व्यक्तियों के भरण-पोषण का दावा 500 रूपए प्रतिमाह तक सीमित रखा गया है किंतु अपराध दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम 2001 2001 का 50वां के अनुसार यह सीमा हटा दी गई है। इस संहिता के अंतर्गत भरण-पोषण के अधिकार को शामिल करने से बड़ा लाभ यह हुआ है कि भरण-पोषण की राशि जल्दी और कम खर्च में मिलने लगी है। वे तलाकशुदा पत्नियां जिन्हें परंपरागत वैयक्तिक कानून के अंतंर्गत गुजारा राशि मिलती है दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण की राशि पाने की अधिकारिणी नहीं हैं।हिंदू कानून के अनुसार पत्नी को अपने पति से भरण पोषण प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है लेकिन अगर वह पतिव्रता नहीं रहती हैं तो वह अपने इस अधिकार से वंचित हो जाती हैं। भरण पोषण का उसका अधिकार हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम 1956 में संहिताबद्ध है। भरण पोषण की रकम निर्धारित करते समय न्यायालय अनेक बातों को ध्यान में रखता है जैसे पिता की आर्थिक स्थिति और देनदारियां। न्यायालय इस बात का भी निर्णय करता है कि पत्नी का पति से पृथक रहना न्यायसंगत है या नहीं। न्यायसंगत मानने योग्य कारण इस अधिनियम में उल्लिखित हैं। मुकदमा चलाने की अवधि के दौरान भरण पोषण निर्वाह व्यय और विवाह संबंधी मुकदमें के खर्च का भी वहन या तो पति द्वारा किया जाएगा या पत्नी द्वारा बशर्ते दूसरे पक्ष पति या पत्नी की कोई स्वतंत्र आय नहीं हो। स्थायी भरण पोषण के भुगतान के बारे में भी यही सिद्धांत लागू होगा।

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Income Tax

आज हम आपको सेवाकर के बारे मे बताने जा रहे है कि सेवा कर क्या है। 31 मार्च को फाइनैंशल ईयर खत्म होने के बाद टैक्सेबल आमदनी वाले हर शख्स को इनकम टैक्स विभाग में एक फॉर्म भरकर देना होता है। इस फॉर्म में वह बताता है कि पिछले फाइनैंशल ईयर में उसे कुल कितनी आमदनी हुई और उसने उस आमदनी पर कितना टैक्स भरा। इसे इनकम टैक्स रिटर्न कहा जाता है। इन्हें भरना है रिटर्न इनकम टैक्स रिटर्न उन सभी लोगों को भरना जरूरी है जिनकी कुल सालाना आमदनी (आईटी ऐक्ट के मुताबिक मिलने वाले किसी भी तरह के डिडक्शन से पहले टैक्सेबल है। जिन पुरुषों की सालाना आमदनी एक लाख 60 हजार रुपये से ज्यादा है वे आईटी रिटर्न भरेंगे। जिन महिलाओं की सालाना आमदनी एक लाख 90 हजार रुपये से ज्यादा है वे रिटर्न भरेंगी। जिन बुजुर्गों की सालाना आमदनी दो लाख 40 हजार रुपये से ज्यादा है वे रिटर्न भरेंगे। जिन लोगों पुरुषों महिलाओं और बुजुर्गों की सालाना आमदनी ऊपर दी गई सीमा से कम है उन्हें आईटी रिटर्न भरने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन अगर ऐसे लोगों का टीडीएस कट चुका है तो उन्हें रिटर्न भरना चाहिए जिससे वे रिफंड क्लेम कर सकें। अगर किसी के पास पैन है लेकिन उसकी सालाना आमदनी ऊपर दी गई सीमा से कम है तो उसे भी रिटर्न नहीं भरना है। पैन और रिटर्न रिटर्न भरने के लिए पैन होना जरूरी है। अगर सालाना आमदनी टैक्सेबल है तो पैन लेना अनिवार्य है। ऐसे लोग अगर अपने एम्प्लॉयर को पैन उपलब्ध नहीं कराते है तो एम्प्लॉयर उनका 20 फीसदी या उससे भी ज्यादा रेट पर टीडीएस काट सकता है। टैक्सेबल इनकम नहीं है तो पैन लेना अनिवार्य नहीं है फिर भी कई तरह के वित्तीय लेन-देन और इंश्योरेंस के मामले में पैन की जरूरत होती है इसलिए बेहतर यही है कि पैन सभी को बनवा लेना चाहिए। इनकम टैक्सेबल होने पर अगर किसी के पास पैन नहीं है तो पैन न होने के लिए कोई सजा नहीं है सजा इस बात के लिए हो सकती है कि पैन न होने के चलते आप रिटर्न फाइल नहीं करा पाए या आपने अपनी आमदनी को छिपाया। जिन लोगों का टीडीएस उनकी कंपनी द्वारा काटा जा चुका है और उन पर टैक्स की कोई देनदारी नहीं बनती वे 31 मार्च 2010 तक भी अपना रिटर्न जमा कर सकते हैं। ऐसे लोग अगर 31 मार्च 2011 तक अपना रिटर्न जमा नहीं करा पाते तो उसके बाद उन पर पांच हजार रुपये का जुर्माना लग सकता है। रिटर्न भरने से पहले अपने सारे बैंक खातों की पूरे साल की स्टेटमेंट देखें। किस-किस मद में पैसा गया और किस-किस सोर्स से पैसा आया उसे आइटम वाइज लिखते जाएं। इससे आपको सही-सही पता चल जाएगा कि साल में आपने इनवेस्ट कहां कितना किया और आपको आमदनी कहां से कितनी हुई। इससे आप ब्याज आदि से हुई आमदनी को याद कर पाएंगे। रिटर्न भरने में यह आपके काम आएगी। लास्ट डेट सैलरीड लोगों के लिए 31 जुलाई बिजनेस वाले लोगों के लिए अगर वे अपनी आमदनी की ऑडिटिंग नहीं कराते 31 जुलाई सेल्फ एम्प्लॉइड लोगों के लिए अगर ऑडिटिंग नहीं कराते 31 जुलाई ऐसे सभी लोगों फर्मों या कंपनियों के लिए जो अपनी आमदनी की ऑडिटिंग कराते हैं  जिन लोगों का टीडीएस उनकी कंपनी द्वारा काटा जा चुका है और उन पर टैक्स की कोई देनदारी नहीं बनती वे 31 मार्च 2011 तक भी अपना रिटर्न जमा कर सकते हैं लेकिन ऐसे लोग अगर 31 मार्च 2011 तक अपना रिटर्न जमा नहीं करा पाते हैं तो उन पर पांच हजार रुपये का जुर्माना लग सकता है। कौन सा फॉर्म किसके लिए आईटीआर 1 उन लोगों को भरना है जिन्हें सैलरी पेंशन और ब्याज से आमदनी हुई। जिन लोगों के पास एक मकान है और उन्होंने हाउसिंग लोन ले रखा है उन्हें भी यही फॉर्म भरना है। आईटीआर 2 अगर आपको सैलरी पेंशन और ब्याज से हुई आमदनी के अलावा एक से ज्यादा प्रॉपर्टी से आने वाले किराये कैपिटल गेंस डिविडेंड से भी किसी तरह की कोई आमदनी हुई है तो आपको आईटीआर 2 भरना होगा। एचयूएफ के लिए भी यही फॉर्म है। आईटीआर 3 अगर आप किसी फर्म में पाटर्नर हैं तो आईटीआर 3 भरें। आईटीआर 4 आईटीआर 4 उन लोगों को भरना होता है जिन्हें किसी बिजनेस फर्म आदि से इनकम होती है। इसके अलावा स्वरोजगार में लगे लोगों जैसे वकील डॉक्टर और चार्टर्ड अकाउंटेंट आदि को भी आईटीआर 4 फॉर्म ही भरना होता है। अगर आप सैलरीड हैं तो आपको आपकी कंपनी ने फॉर्म 16 दिया होगा। फॉर्म 16 में आपकी कुल आमदनी टैक्स कटौती और बचत का ब्यौरा दिया होगा। सैलरीड क्लास के लोगों को इस फॉर्म की मदद से आईटी रिटर्न भरना है। याद रहे, रिटर्न के साथ कोई भी डॉक्यूमेंट नहीं लगाना है। फॉर्म 16 भी नहीं। सैलरी के अलावा अगर आमदनी का कोई और भी स्त्रोत है जैसे ब्याज से होने वाली आमदनी आदि तो उसका जिक्र भी रिटर्न में जरूर करें। जमा कहां करें सैलरीड क्लास के लोग अपना भरा हुआ रिटर्न फॉर्म मयूर भवन कनॉट प्लेस नई दिल्ली में अपने असेसमेंट ऑफिसर के पास जमा करा सकते हैं। असेसमेंट ऑफिसर के बारे में जानने के लिए इनकम टैक्स की वेबसाइट पर जाएं और पैन पर क्लिक करें। इसके बाद नो योर एओ पर क्लिक करें। अब आपसे आपका पैन मांगा जाएगा। पैन भरने के बाद एंटर दबाएं और फिर पेज को लेफ्ट की तरफ खिसकाएं। अब अपने आईटीओ वॉर्ड से संबंधित पूरी जानकारी आपके सामने होगी। रिफंड अगर टीडीएस कट जाने के बाद आपने टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट किया है तो उसे इनकम टैक्स विभाग से रिफंड करा सकते हैं। रिटर्न फाइल करने के कुछ महीने के अंदर आपको रिफंड मिल जाएगा। यह आपके बैंक अकाउंट में क्रेडिट कर दिया जाता है। अगर रिटर्न भरते वक्त आपको पता चलता है कि आपके ऊपर टीडीएस के अलावा भी टैक्स की देनदारी बन रही है तो उस टैक्स को आपको नैशनलाइज्ड बैंकों की तय शाखाओं में चालान भरकर जमा करा देना चाहिए। कब तक रखें रेकॉर्ड इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक वर्तमान करंट फाइनैंशल ईयर से छह साल पहले तक के मामलों में कानूनी धरपकड़ हो सकती है इसलिए रिटर्न आदि का छह साल तक का रेकॉर्ड आपके पास सुरक्षित होना चाहिए। भरने के तरीके इनकम टैक्स रिटर्न अपने फॉर्म 16 की मदद से आप खुद भरकर जमा करा सकते हैं। फॉर्म 16 की मदद से रिटर्न खुद कैसे भरें इसका तरीका दिया जा रहा है। इसके अलावा रिटर्न भरने के ये तरीके भी हैं 1 टीआरपी की मदद से इस लिंक पर जाएं लोकेट योर नीयरेस्ट टीआरपी क्लिक करें। इसके बाद सर्च टीआरपी में जाने के बाद अपना प्रदेश और जिले का नाम भर दें। आपके क्षेत्र के टीआरपी के नाम पते और फोन नंबर आपको मिल जाएंगे। इनसे संपर्क करें। समय-समय पर इनकम टैक्स विभाग टीआरपी के बारे में अखबारों में भी सूचना देता रहता है। कोई भी टीआरपी देश में कहीं भी मौजूद आदमी का रिटर्न भर सकता है। टीआरपी को पहचानने के लिए उनका आईडी कार्ड या सर्टिफिकेट देखें। टीआरपी को अपने फॉर्म 16 की फोटोस्टैट दें ओरिजनल डॉक्यूमेंट न दें। इसकी मदद से वह रिटर्न भरेगा और जमा करेगा। रिटर्न जमा करने के बाद टीआरपी आपको उसकी रसीद देगा। रिटर्न भरने में कोई गड़बड़ी होती है तो इसके लिए टीआरपी जिम्मेदार होगा। खर्च कितनारू रिटर्न भरकर जमा करने का काम टीआरपी बिना किसी फीस के करते हैं लेकिन फिर भी वे अधिकतम 250 रुपये तक चार्ज कर सकते हैं। 2 ई-रिटर्न …

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IPC (Indian Panel Code)

भारतीय समाज को कानूनी रूप से व्यवस्थित रखने के लिए भारतीय दंड संहिता बनाई गई थी जोकि सन 1860 में लार्ड मेकाले की अध्यक्षता में बनाई गई थी। इस संहिता में विभिन्न अपराधों को सूचीबद्ध कर उस में गिरफ्तारी और सजा का उल्लेख किया गया है। इस में कुल मिला कर 511 धाराएं हैं। कुछ खास धाराएं निम्न हैंधारा 307 = हत्या की कोशिशधारा 302 =हत्या का दंडधारा 376 = बलात्कारधारा 395 = डकैतीधारा 377= अप्राकृतिक कृत्यधारा 396= डकैती के दौरान हत्याधारा 120= षडयंत्र रचनाधारा 365= अपहरण>धारा 201= सबूत मिटानाधारा 34= सामान आशयधारा 412= छीनाझपटीधारा 378= चोरीधारा 141=विधिविरुद्ध जमावधारा 191= मिथ्यासाक्ष्य देनाधारा 300= हत्या करनाधारा 309= आत्महत्या की कोशिशधारा 310= ठगी करनाधारा 312= गर्भपात करनाधारा 351= हमला करनाधारा 354= स्त्री लज्जाभंगधारा 362= अपहरणधारा 415= छल करनाधारा 445= गृहभेदंनधारा 494= पति/पत्नी के जीवनकाल में पुनःविवाहधारा 499= मानहानिधारा 511= आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों को करने के प्रयत्न के लिए दंड।धारा       अपराध                   सजा                       जमानत/गिरफ्तारी 13- जुआ खेलना/सट्टा लगाना                            1 वर्ष की सजा और 1000 रूपये जुर्माना-सांप्रदायिक दंगा भड़काने में लिप्त                   5 वर्ष की सजा99  से 106 -व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के लिए बल प्रयोग का अधिकार147-बलवा करना                                           2 वर्ष की सजा/जुर्माना या दोनों   गिरफ्तार/जमानत होगी161-रिश्वत लेना/देना                                        3 वर्ष की सजा/जुरमाना या दोनों  गिरफ्तार/जमानत नहीं171-चुनाव में घूस लेना/देना                             1 वर्ष की सजा/500 रुपये जुर्माना  गिरफ्तार नहीं/जमानत होगी177- सरकारी कर्मचारी/पुलिस को गलत सूचना देना  6 माह की सजा/1000 रूपये जुर्माना186-सरकारी काम में बाधा पहुँचाना                3 माह की सजा/500 रूपये जुर्माना 191 झूठी गवाही देना193-न्यायालयीन प्रकरणों में झूठी गवाही          3/ 7 वर्ष की सजा और जुरमाना 216- लुटेरे/डाकुओं को आश्रय देने के लिए दंड224/25 -विधिपूर्वक अभिरक्षा से छुड़ाना        2 वर्ष की सजा/जुरमाना/दोनों231/32 जाली सिक्के बनाना                       7 वर्ष की सजा और जुर्माना  गिरफ्तार/जमानत नहीं255-सरकारी स्टाम्प का कूटकरण                10 वर्ष या आजीवन कारावास की सजा 264-गलत तौल के बांटों का प्रयोग                1 वर्ष की सजा/जुर्माना या दोनों      गिरफ्तार/जमानत होगी267- औषधि में मिलावट करना272- खाने/पीने की चीजों में मिलावट        6 महीने की सजा/1000 रूपये जुर्माना /दोनों गिरफ्तार नहीं/जमानत होगी274 /75- मिलावट की हुई औषधियां बेचना279- सड़क पर उतावलेपन/उपेक्षा से वाहन चलाना  6 माह की सजा या 1000 रूपये का जुरमाना292-अश्लील पुस्तकों का बेचना                  2 वर्ष की सजा और 2000 रूपये जुर्माना    गिरफ्तार/जमानत होगी294- किसी धर्म/धार्मिक स्थान का अपमान  2 वर्ष की सजा302- हत्या/कत्ल (Murder)                     आजीवन कारावास /मौत की सजा   गिरफ्तार/जमानत नहीं306- आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण                10 वर्ष की सजा और जुरमाना309- आत्महत्या करने की चेष्टा करना        1 वर्ष की सजा/जुरमाना/दोनों     गिरफ्तार/जमानत311- ठगी करना                                       आजीवन कारावास और जुरमाना   गिरफ्तार/जमानत नहीं323- जानबूझ कर चोट पहुँचाना354- किसी स्त्री का शील भंग करना         2 वर्ष का कारावास/जुरमाना/दोनों     गिरफ्तार/जमानत363- किसी स्त्री को ले भागना             7 वर्ष का कारावास और जुरमाना  गिरफ्तार/जमानत366- नाबालिग लड़की को ले भागना376- बलात्कार करना                    10 वर्ष/आजीवन कारावास   गिरफ्तार नहीं /जमानत होगी377-अप्राकृतिक कृत्य अपराध     5 वर्ष की सजा और जुरमाना गिरफ्तार/जमानत नहीं379-चोरी (सम्पत्ति) करना                      3 वर्ष का कारावास /जुरमाना/दोनों  गिरफ्तार/जमानत392-लूट                                                10 वर्ष की सजा395-डकैती                                     10 वर्ष या आजीवन कारावास   गिरफ्तार नहीं/जमानत417- छल/दगा करना                 1 वर्ष की सजा/जुरमाना/दोनों   गिरफ्तार नहीं/जमानत होगी420- छल/बेईमानी से सम्पत्ति अर्जित करना   7 वर्ष की सजा और जुरमाना446-रात में नकबजनी करना426- किसी से शरारत करना               3 माह की सजा/जुरमाना/दोनों463- कूट-रचना/जालसाजी477(क)-झूठा हिसाब करना489-जाली नोट  बनाना/चलाना               10 वर्ष की सजा/आजीवन कारावास  गिरफ्तार/जमानत नहीं493- पर स्त्री से व्यभिचार करना             10 वर्षों की सजा494-पति/पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना 7 वर्ष की सजा और जुरमाना गिरफ्तार नहीं/जमानत होगी498/अ- अपनी स्त्री पर अत्याचार           3 वर्ष तक की कठोर सजा497- जार कर्म करना                        5 वर्ष की सजा और जुरमाना500- मान हानि                                       2 वर्ष  की सजा और जुरमाना509- स्त्री को  अपशब्द कहना /अंगविक्षेप  करना   सादा  कारावास या जुरमाना

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Service Tax

सेवाकर के बारे मे जारी जानिए सेवाकर क्या है सेवाकर किसी व्यक्ति द्वारा प्रदान की गई सेवाओं पर लगाया जाता है और इस कर का भुगतान करने की जिम्मेदारी सेवा प्रदाता की होती है। यह एक अप्रत्यक्ष कर है क्योंकि यह सेवा प्रदाता द्वारा उसके व्यावसायिक लेन-देन की अवधि में सेवा प्राप्तकर्ता से वसूल किया जाता है। भारत में सेवा कर वित्त अधिनियम, 1994 के अध्याय V द्वारा इस वर्ष 1994 में शुरू किया गया है। वर्ष 1994 में प्रारम्भिक रूप में यह कर सेवाओं के तीन सैटों पर लगाया गया था और तब से सेवा कर का कार्यक्षेत्र में  अनुवर्ती वित्त अधिनियमों द्वारा निरन्तर विस्तार किया जा रहा है। वित्त अधिनियम के तहत सेवा कर की उगाही जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में की जा रही है।वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग के तहत केंद्रीय उत्पाद शुल्क एवं सीमा शुल्क बोर्ड सीबीईसी सेवा कर लगाने और वसूल करने से संबंधित नीति तैयार करने का कार्य करता है। केंद्रीय सरकार प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए सेवा कर के निर्धारण और वसूली के प्रयोजनार्थ सेवा कर  नियामवली तैयार करती है। सेवा कर केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड के अधीन कार्यरत विभिन्न केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्तालयों  द्वारा प्रशासित किया जा रहा है। दिल्ली मुम्बई कोलकाता चेन्नै अहमदाबाद और बैंगलोर आदि महानगरों में छह आयुक्तालय स्थित हैं जो पूर्णतया  सेवा कर से संबंधित कार्य करते हैं। मुम्बई स्थित सेवा कर निदेशालय तकनीकी और नीतिगत स्तर पर समन्वयन के लिए क्षेत्रीय स्तर के कार्यकलापों का निरीक्षण करता है। पंजीकरणसेवा कर चुकाने वाले व्यक्ति विशेष कर योग्य सेवा पर कर लागू होने लगाए जाने की तारीख के तीस दिनों के अंदर अथवा उसकी गतिविधि शुरू होने के तीस दिनों के अंदर पंजीकरण के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। कर योग्य सेवा के प्रत्येक सेवा प्रदाता से अपेक्षा की जाती है कि वह फार्म एसटी-1 दोहरी प्रतियों में आधिकारिक केंद्रीय उत्पाद शुल्क कार्यालय को प्रस्तुत करके पंजीकरण प्राप्त करें।पंजीकृत सेवा प्रदाता को निर्धारिती कहा जाएगा।निर्धारिती द्वारा एक से अधिक कर योग्य सेवाएं प्रदान किए जाने पर भी एकल पंजीकरण प्रर्याप्त होगा। तथापित वह पंजीकरण के लिए आवेदन में उन सभी सेवाओं का उल्लेख करेगा जो उसके द्वारा प्रदान की जा रही हैं  और क्षेत्रीय कार्यालय पंजीकरण प्रमाणपत्र में उपयुक्त प्रविष्टियांध्अनुमोदन अंकित करेगा। किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर व्यवसाय का अंतरण किए जाने के मामले में नए सिरे से पंजीकरण प्राप्त करना  अपक्षित होगा। कोई भी पंजीकृत निर्धारिती जब कर योग्य सेवा प्रदान करना बंद कर देता है तो उसे पंजीकरण प्रमाणपत्र को तत्काल  अभ्यार्पित करना होगा।यदि कोई निर्धारिती उसी स्थान से कोई नई सेवा प्रदान करना प्रारंभ करता है तो उसे नए सिरे से पंजीकरण के लिए  आवेदन करने की जरूरत नहीं होगी। वह अपनी वर्तमान सूचना में जो आवश्यक संशोधन करना चाहता है उन्हीं को एसटी-1 फार्म में भर भेज देगा। नया फार्म उनके पंजीकरण प्रमाणपत्र में नई सेवा श्रेणी के लिए आवश्यक मंजूरी हेतु आधिकारिक अधीक्षक को प्रस्तुत किया जाएगा। व्यक्तियों अथवा संबंधित स्वामी और साझेदार फर्म के मामले में सेवा कर तिमाही आधार पर अदा किया जाएगा। सेवा कर के भुगतान की निश्चित तारीख संबंधित तिमाही के बिल्कुल बाद के महीने की पांच तारीख होगी तिमाहियां है अप्रैल से जून जुलाई से सितम्बर अक्तूबर से दिसम्बर और जनवरी से मार्च के लिए भुगतान 31 मार्च को ही किया जाएगा। सेवा प्रदाता की ऊपर निर्दिष्ट श्रेणी के अलावा कोई अन्य श्रेणी होने पर सेवा कर का का भुगतान मासिक आधार पर  अर्थात् अगले महीने की पांच तारीख को किया जाएगा। लेकिन मार्च माह के संबंध में भुगतान 31 मार्च को ही किया जाएगा। सेवा कर का भुगतान निर्धारिति द्वारा संबंधित अवधि अर्थात महीना अथवा तिमाही जैसा भी मामला होगा के दौरान  वसूलध्प्राप्त की गई राशि पर किया जाएगा।सेवा कर की खास विशेषता है कर वसूली पर भरोसा प्रमुख रूप से स्वैच्छिक रूप से अनुपालन के जरिए सेवा कर दाताओं द्वारा सेवा कर विवरिणयों का स्वयं मूल्यांकन करने की प्रणाली 1 अप्रैल 2001 से शुरू की गई है। केंद्रीय उत्पाद शुल्क का आधिकारिक अधीक्षक को मूल्यांकित विवरणियों की यथातथ्यता की प्रति सत्यापित करने के लिए प्राधिकृत किया गया है। अनुमान है कि कर विवरणियां छः माही रूप से प्रस्तुत की जाएंगी। संभावित कर दाताओं को कर तंत्र के तहत लाने के लिए केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिकारियों को सर्वेक्षण करने के लिए  प्राधिकृत किया गया है।सेवाकर सेवा प्रदाता द्वारा योग्य सेवा प्रदान करने के लिए प्रभारित सकल राशि के 12 प्रतिशत की दर पर देय होगा।

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Knowlegde of Indian Dowry Law

भारतीय तालाक कानून भारत में तलाक और दुबारा विवाह को कानून की मंजूरी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत मिली हुई है परन्तु करीबन 55 साल के चले आ रहे इस कानून की तुलना अगर हम मौजूदा परिप्रेक्ष्य में करें तो हर पुरानी हुई चीज की तरह इसमें भी त्रुटियां है अतः इस कानून में भी बदलाव की जरूरत हैइसी के तहत केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मौजूदा अधिनियम में बदलाव के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी सरकार इसके लिए विवाह कानून संशोधन विधेयक संसद में पेश करेगी सूचना व प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के अनुसार कानून में नए संशोधनों के तहत वैवाहिक रिश्तों के खत्म होने को तलाक का आधार बनाया गया है अतः अब तलाक लेना आसान हो जाएगा विवाह दो दिलों का मिलन विवाह एक ऐसा पवित्र बंधन है जहाँ दो दिल और दो परिवार आपस में एक अनूठे बंधन में बंध जाते हैं एक लडकी अपना परिवार छोडकर अपने पति का साथ निभाने के लिए उसके परिवार का हिस्सा बन जाती है कहते हैं कि जीवन एक गाडी की तरह है और पति–पत्नी उस गाडी के दो पहिये जिनके संतुलन से जीवन की गाड़ी चलती है अगर संतुलन बना रहेगा तो गाडी सही चलेगी परन्तु यदि एक भी पहिए का संतुलन बिगड़ा तो वह परिवार बिखरने की स्थिति में आ जाता है और तलाक तक की नौबत आ जाती है परन्तु क्या तलाक बिगड़ते हुए रिश्तों को सुलझाने की सही दवा है क्या शादी जैसे पवित्र रिश्ते की डोर इतनी कमजोर होती है कि आपसी कलह के चलते इस डोर को तोड़ा जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 को भारतीय परिवारों की अखंडता का मुख्य कारण भी कहा जा सकता है यह हिंदू विवाह अधिनियम की जटिलता ही है जिसके कारण आज भी हम एक परिवार में रहते हैं हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार एक दम्पत्ति नाजायज शारारिक संबंध आपसी झगड़े के बढ़ने दूसरे साथी के मानसिक रूप से बीमार होने या फिर हिंदू धर्म से किसी और धर्म में परिवर्तित होने की स्थिति में तलाक के लिए न्यायालय जा सकता है अगर कोई दम्पत्ति तलाक के सिलसिले में कानून का दरवाजा खटखटाता है तो ऐसी स्थिति में न्यायालय दोनों को कुछ वक्त तक अलग रहने या साथ रहने को कह सकता है ताकि वह अपने फैसले पर पुनःविचार कर सकें और तलाक लेने के फैसले को बदल सकें क्या है परिवार न्यायालय परिवार न्यायालय एक विशेष तरह का न्यायलय है जिसे तहत परिवार में बढते आपसी झगड़े और कलह को आसानी से सुलझाने का प्रयत्न किया जाता है अगर एक दंपत्ति के जीवन में परेशानी है और वह तलाक लेना चाहते हैं तो ऐसे स्थिति में परिवार न्यायालय उनको छः महीनों तक अलग रहने का आदेश देता है जिससे वह अपने फैसले पर पुनः विचार कर सके तलाक के प्रमुख कारण किसी और व्यक्ति या स्त्री से शारीरिक संबंध होनानपुंसकता दूसरा कारण है जिसके द्वारा तलाक की नौबत उत्पन्न होती हैआपके जीवनसाथी का अतीत भी तलाक की वजह बन सकता हैकिसी व्यक्ति का मानसिक रूप से सही ना होनाधोखा देना या बेवफाई करनाशादी के बाद दहेज की मांग करनाएक दूसरे के विचारों में समानता ना होनाआर्थिक तंगी के चलतेअगर आप किसी तरह का नशा करते होंदोनों के शैक्षिक योग्यता में अंतर होनासांस्कृतिक या जाति–धर्म का अंतर होनादूसरे व्यक्ति का आपके घरेलू मामलों में दखल देनाआपसी कलह और झगड़ा

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